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क्या एक मुसलमान नैतिकता और इतिहास आदि के सापेक्षवादी सिद्धांतों को स्वीकार करता है?

यह अतार्किक है कि अपनी ख़्वाहिश से निर्देशित मानव निर्धारित करे कि बलात्कार बुरा है कि नहीं। यह स्पष्ट है कि बलात्कार अपने आप में मानव अधिकार का उल्लंघन और उसके महत्व एवं स्वतंत्रता को छीन लेना है। यही प्रमाण है इस बात का कि बलात्कार बुरी चीज़ है। साथ ही समलैंगिकता और शादी के अलावा रिश्ते, सार्वभौमिक मानदंडों का उल्लंघन हैं। सही ग़लत नहीं होगा यद्यपि पूरी दुनिया उसे ग़लत कहने पर उतर आए। इसी तरह ग़लत भी सूरज की तरह स्पष्ट है, यद्यपि पूरी मानव जाति उसे सही कहने पर सहमत हो जाए।

इसी तरह इतिहास की बात है। यदि हम यह मान लें कि हर युग के लिए उचित है कि वह अपने दृष्टिकोण के अनुसार इतिहास लिखे, इसलिए कि महत्वपूर्ण एवं अहम चीज़ को परखने की कसौटी हर युग की दूसरे युग से अलग होती है। परन्तु यह इतिहास को सापेक्ष नहीं बनाता है। इसलिए कि यह इस बात को नकारता नहीं है कि घटनाओं की एक ही वास्तविकता होती है। हम मानें या न मानें। घटनाओं की विकृति तथा अशुद्धता की संभावना रखने वाला और ख़्वाहिश पर आधारित मानव इतिहास सारे संसारों के रब के द्वारा बताए गए इतिहास से अलग है, जिसमें भूत, वर्तवान एवं भविष्य की घटनाओं को बयान करने में कमाल दर्जे की सूक्ष्मता दिखलाई गई है।

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