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एक मुसलमान आत्माओं के आवागवन के सिद्धांत में विश्वास क्यों नहीं करता है?

ब्रह्मांड में सब कुछ अल्लाह के नियंत्रण में है। वह अकेला ही व्यापक ज्ञान, पूर्ण जानकारी और सब कुछ अपनी इच्छा के अधीन करने की क्षमता और शक्ति रखता है। सृष्टि की शुरुआत से ही सूर्य, ग्रह और आकाशगंगाएँ अत्यधिक सटीकता के साथ काम कर रही हैं और यह सटीकता और क्षमता मनुष्य की रचना पर समान रूप से लागू होती है। मानव शरीर और उनकी आत्माओं के बीच मौजूद सामंजस्य से पता चलता है कि इन आत्माओं का जानवरों के शरीर में वास करना संभव नहीं है और वे पौधों, कीड़ों और यहाँ तक कि लोगों के बीच भी चक्कर नहीं लगा सकतीं। अल्लाह ने मनुष्य को बुद्धि और ज्ञान से दिया है, उसे धरती पर खलीफा बनाया है, उसे श्रेष्ठता दी है, सम्मान दिया है एवं दूसरी बहुत सारी सृष्टियों पर उसके दर्ज़ा को ऊँचा किया है। सृष्टिकर्ता की हिकमत एवं न्याय की माँग यह थी कि क़यामत का दिन हो, जिस दिन अल्लाह सभी सृष्टियों को दोबारा उठाएगा और अकेला ही उनका हिसाब लेगा। फिर उसके बाद उनका ठिकाना जन्नत होगा या जहन्नम और उस दिन हर तरह के बुरे या अच्छे कामों को तौला जाएगा।

"तो जिसने कण के बराबर भी पुण्य (नेकी) किया होगा, वह उसे देख लेगा। और जिसने कण के बराबर भी पाप किया होगा, वह उसे देख लेगा।'' [86] अल्लाह लोगों से अपने अज़ली (जो हमेशा से है) ज्ञान के अनुसार लिखे गए कर्मों का हिसाब कैसे लेगा, जिसे क़ज़ा एवं क़द्र के नाम से जाना जाता है?

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